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क्या शादी का नोटिस वापस लिया जा सकता है?

Answer By law4u team

भारतीय कानून के अंतर्गत विशेष विवाह अधिनियम, 1955 (Special Marriage Act, 1955) के तहत जब कोई व्यक्ति विवाह के लिए रजिस्ट्रार के पास नोटिस देता है, तो इस प्रक्रिया और उसे वापस लेने के संबंध में विशेष कानूनी प्रावधान बनाए गए हैं। इस विषय को विस्तार से समझना आवश्यक है ताकि विवाह प्रक्रिया के दौरान किसी भी प्रकार की कानूनी उलझन से बचा जा सके। सबसे पहले यह जानना महत्वपूर्ण है कि विशेष विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 5 के अनुसार, विवाह करने वाले दोनों पक्षों को विवाह अधिकारी (Marriage Officer) को लिखित रूप में एक नोटिस देना होता है। यह नोटिस उस जिले के विवाह अधिकारी को दिया जाता है जहाँ कम से कम एक पक्ष ने विवाह की तारीख से कम से कम 30 दिन पहले निवास किया हो। जब यह नोटिस विवाह अधिकारी द्वारा प्राप्त कर लिया जाता है, तब धारा 6 के तहत उस नोटिस को कार्यालय के एक सुगम स्थान पर चस्पा किया जाता है ताकि आम जनता को इसकी जानकारी मिल सके। इस नोटिस का उद्देश्य यह होता है कि यदि किसी को इस विवाह पर कोई वैध आपत्ति (Objection) है, तो वह अगले 30 दिनों के भीतर अपनी आपत्ति दर्ज करा सकता है। अब मुख्य प्रश्न यह है कि क्या इस प्रकार दिए गए विवाह के नोटिस को वापस लिया जा सकता है? इसका उत्तर यह है कि विशेष विवाह अधिनियम, 1955 के तहत एक बार विवाह का नोटिस विधिवत दे दिए जाने के बाद, कोई भी पक्ष अकेले उस नोटिस को रद्द या वापस नहीं कर सकता है। यदि दोनों पक्ष आपसी सहमति से अपने कदम पीछे हटाना चाहते हैं, तो वे विवाह अधिकारी को लिखित रूप में सूचित कर सकते हैं कि वे अब इस नोटिस के आधार पर आगे विवाह नहीं करना चाहते हैं। यदि 30 दिन की अवधि पूरी होने से पहले दोनों पक्षों में से कोई एक पक्ष पीछे हट जाता है या दोनों पक्ष आपसी सहमति से अपने आवेदन को रद्द करना चाहते हैं, तो विवाह अधिकारी उस मामले को आगे नहीं बढ़ाएगा। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि केवल एक पक्ष के चाहने से नोटिस तुरंत निरस्त हो जाएगा, क्योंकि यह एक वैधानिक प्रक्रिया है जो दोनों पक्षों के संयुक्त हस्ताक्षर और सहमति से शुरू होती है। विशेष विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 7 के तहत कोई भी व्यक्ति इस नोटिस के खिलाफ आपत्ति दर्ज करा सकता है, लेकिन वह आपत्ति केवल कानून में दी गई योग्यताओं के आधार पर ही होनी चाहिए, जैसे कि पक्षकारों की आयु पूरी न होना, पहले से वैवाहिक संबंध होना, या मानसिक अस्वस्थता। यदि कोई आपत्ति दर्ज की जाती है, तो विवाह अधिकारी धारा 8 के तहत उसकी जांच करता है। यदि जांच के बाद आपत्ति को सही पाया जाता है, तो विवाह अधिकारी विवाह करने से मना कर सकता है, और ऐसी स्थिति में स्वतः ही वह प्रक्रिया समाप्त हो जाती है। लेकिन यदि कोई आपत्ति नहीं आती है और 30 दिन की अवधि समाप्त हो जाती है, तो धारा 12 के अनुसार विवाह संपन्न कराया जा सकता है। यदि कोई पक्ष 30 दिन की अवधि के भीतर या उसके बाद अपनी मर्जी से विवाह नहीं करना चाहता है, तो वह विवाह अधिकारी के समक्ष उपस्थित होकर यह स्पष्ट रूप से कह सकता है कि वह इस विवाह को आगे नहीं बढ़ाना चाहता। ऐसी स्थिति में विवाह अधिकारी उस नोटिस की कार्यवाही को बंद कर देता है। ध्यान देने योग्य बात यह है कि एक बार नोटिस रद्द होने या वापस ले लिए जाने के बाद, यदि भविष्य में वे लोग फिर से विवाह करना चाहते हैं, तो उन्हें विशेष विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 5 के तहत नए सिरे से दोबारा 30 दिन का नया नोटिस देना होगा। पुराना नोटिस समाप्त हो जाने के बाद उसका कोई कानूनी प्रभाव नहीं रहता है। अतः निष्कर्ष यह है कि कानूनी रूप से नोटिस को केवल तभी निष्प्रभावी किया जा सकता है जब दोनों पक्ष अपनी सहमति दें या विवाह अधिकारी किसी वैध आपत्ति के आधार पर विवाह की अनुमति देने से इनकार कर दे। किसी भी कानूनी कदम को उठाने से पहले संबंधित क्षेत्र के विवाह कार्यालय के नियमों और स्थानीय प्रक्रियाओं की पूरी जानकारी अवश्य प्राप्त कर लेनी चाहिए।

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